बिलासपुर

उद्घाटन के डेढ़ साल बाद भी रेफरल सेंटर बना कोनी अस्पताल ; कांग्रेस ने पूछा- सरकारी पैसे से बने अस्पताल में निजी भागीदारी क्यों?

करीब 200 करोड़ रुपये की लागत से कोनी में निर्मित 240 बिस्तरों वाले सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल और 100 बिस्तरों वाले कैंसर केयर अस्पताल के संचालन को लेकर कांग्रेस ने राज्य सरकार पर कई सवाल उठाए हैं। पूर्व जिला कांग्रेस अध्यक्ष एवं बेलतरा विधानसभा के पूर्व प्रत्याशी विजय केशरवानी ने गुरुवार को आयोजित प्रेसवार्ता में अस्पताल के लिए प्रस्तावित पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि जब अस्पताल सरकारी जमीन, सरकारी धन और सरकारी संसाधनों से तैयार किया गया है, तो इसके संचालन के लिए निजी भागीदारी की आवश्यकता क्यों पड़ रही है।

उन्होंने कहा कि यह अस्पताल किसी निजी संस्था का उपहार नहीं है, बल्कि जनता के कर के पैसे से निर्मित सार्वजनिक संपत्ति है। ऐसे में सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि पीपीपी मॉडल लागू करने से आम मरीजों को ऐसा कौन-सा अतिरिक्त लाभ मिलेगा, जो सरकारी व्यवस्था के माध्यम से उपलब्ध नहीं कराया जा सकता।

केशरवानी ने कहा कि 29 अक्टूबर 2024 को प्रधानमंत्री द्वारा अस्पताल का उद्घाटन किए जाने और बाद में मुख्यमंत्री द्वारा निरीक्षण करने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि बिलासपुर संभाग के मरीजों को आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं स्थानीय स्तर पर मिलेंगी। हालत यह कि उद्घाटन के लगभग डेढ़ वर्ष बाद भी अस्पताल पूरी क्षमता से संचालित नहीं हो पाया है। यहां विशेषज्ञ चिकित्सकों की पर्याप्त उपलब्धता नहीं है और गंभीर मरीजों को अब भी अन्य अस्पतालों के लिए रेफर किया जा रहा है।

उन्होंने सरकार से सार्वजनिक रूप से यह जानकारी देने की मांग की कि दोनों अस्पतालों के लिए कुल कितने पद स्वीकृत किए गए हैं, वर्तमान में कितने डॉक्टर, नर्स और तकनीकी कर्मचारी कार्यरत हैं तथा शेष पदों पर अब तक नियुक्तियां क्यों नहीं की गईं। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या अस्पताल का उद्घाटन

उन्होंने कहा कि 10 जून 2026 को चिकित्सा शिक्षा विभाग द्वारा जारी पत्र में अस्पताल के संचालन के लिए PP मॉडल अपनाने की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है। उनके अनुसार इस प्रक्रिया में संशोधित आरएफपी, संशोधित लाइसेंस एग्रीमेंट तथा वित्तीय मॉडलिंग और प्रोजेक्शन जैसे दस्तावेज शामिल हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि 26 जून 2026 के एक अन्य पत्र में टेंडर प्रोसेसिंग कमेटी, निविदा प्रक्रिया तथा पीपीपी मॉडल से संबंधित आगे की कार्यवाही का उल्लेख किया गया है। कांग्रेस का दावा है कि इन दस्तावेजों में केपीएमजी को परामर्शदाता एजेंसी के रूप में भी शामिल किया गया है।

कांग्रेस ने सरकार से पूछा है कि आखिर पीपीपी मॉडल अपनाने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई, केपीएमजी को किस उद्देश्य से नियुक्त किया गया तथा निजी भागीदारी से आम मरीजों को क्या अतिरिक्त लाभ मिलेगा। साथ ही गरीब मरीजों के लिए निःशुल्क एवं सुलभ उपचार की क्या गारंटी होगी?

पीपीपी मॉडल लागू होने के बाद अस्पताल का नियंत्रण किसके पास रहेगा, उपचार की दरें कौन तय करेगा, गरीब मरीजों के लिए मुफ्त अथवा रियायती इलाज की क्या व्यवस्था होगी, आयुष्मान भारत योजना से इतर सामान्य मरीजों को कौन-कौन सी सुविधाएं मिलेंगी तथा यदि मरीजों को किसी प्रकार की परेशानी होती है तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी।

कांग्रेस नेता ने कहा कि अस्पताल का नाम स्वर्गीय दिलीप सिंह जूदेव के नाम पर रखा गया है, जिनका नाम जनसेवा और जनविश्वास से जुड़ा रहा है। उनका कहना था कि सरकार यह सुनिश्चित करे कि अस्पताल वास्तव में गरीब और जरूरतमंद मरीजों की सेवा का केंद्र बने तथा यहां उपचार आम लोगों की पहुंच में रहे।

प्रेसवार्ता में कांग्रेस ने सरकार के समक्ष पांच प्रमुख मांगें रखीं। इनमें अस्पताल को तत्काल पूरी क्षमता से शुरू करना, सभी आवश्यक चिकित्सकीय एवं तकनीकी पदों पर शीघ्र भर्ती करना, आईसीयू, कैथ लैब, ऑक्सीजन प्लांट, आपातकालीन सेवाओं तथा एंबुलेंस व्यवस्था को पूर्ण रूप से संचालित करना, पीपीपी मॉडल लागू करने से पहले गरीब मरीजों के अधिकारों की लिखित गारंटी देना तथा पीपीपी से जुड़े सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज और शर्तें सार्वजनिक करना शामिल है।

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