
यह फैसला राज्य के हजारों ऐसे उपभोक्ताओं के लिए झटका माना जा रहा है, जिन्होंने बिजली बिल कम करने और अतिरिक्त बिजली बेचकर निवेश की लागत निकालने के उद्देश्य से रूफटॉप सोलर प्लांट लगाए हैं। आयोग ने यह निर्णय डिस्ट्रीब्यूटेड रिन्यूएबल एनर्जी (DRE) विनियमों और बिजली वितरण कंपनी से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर लिया है।
क्या बदलेगा?
नई खरीद दर केवल उस बिजली पर लागू होगी, जो उपभोक्ता अपनी जरूरत पूरी करने के बाद ग्रिड में भेजेंगे। आयोग का कहना है कि इससे भुगतान व्यवस्था अधिक पारदर्शी और एक समान होगी, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि कम बायबैक रेट भविष्य में सोलर परियोजनाओं में निवेश की रफ्तार को प्रभावित कर सकता है।
नेट मीटरिंग में ऐसे होता है हिसाब
नेट मीटरिंग व्यवस्था में सबसे पहले सोलर प्लांट से बनी बिजली का समायोजन उपभोक्ता की मासिक खपत से किया जाता है। यदि उत्पादन खपत से अधिक होता है, तो बची हुई बिजली ग्रिड में चली जाती है और उसकी यूनिट रिकॉर्ड होती रहती है।
वित्तीय वर्ष समाप्त होने पर इन अतिरिक्त यूनिट का भुगतान निर्धारित बायबैक रेट के अनुसार किया जाता है। यह राशि सीधे उपभोक्ता के बिजली खाते में क्रेडिट होती है और आगामी बिलों में समायोजित कर दी जाती है। नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत के साथ यूनिट का रिकॉर्ड फिर से शून्य से शुरू होता है।
घरेलू और औद्योगिक उपभोक्ताओं में अंतर
मौजूदा व्यवस्था में घरेलू उपभोक्ताओं की सोलर बिजली का समायोजन घरेलू बिजली दरों पर होता है, जबकि औद्योगिक उपभोक्ताओं को उनके औद्योगिक टैरिफ के अनुसार लाभ मिलता है। उद्योगों पर लागू टाइम ऑफ डे (TOD) टैरिफ के कारण अधिक दरों वाले समय में बिजली का मूल्य ज्यादा होता है, जिससे उन्हें नेट मीटरिंग में घरेलू उपभोक्ताओं की तुलना में अधिक फायदा मिलता है
