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मोहम्मद रफ़ी : सुरों के शहंशाह, जिनकी आवाज़ आज भी करोड़ों दिलों में ज़िंदा है

भारतीय फ़िल्म संगीत की दुनिया में जब भी महान गायकों का ज़िक्र होगा, तो सबसे पहले जिन नामों को अदब और मोहब्बत से याद किया जाएगा, उनमें मोहम्मद रफ़ी साहब का नाम सबसे ऊपर होगा। उन्हें केवल एक महान पार्श्व गायक कहना उनकी शख्सियत को छोटा कर देना होगा। वे अपनी बेमिसाल आवाज़, सादगी, ख़ुलूस, इंसानियत और धार्मिक जीवन के कारण करोड़ों लोगों के दिलों में आज भी ज़िंदा हैं।

24 दिसंबर 1924 को पंजाब के कोटला सुल्तान सिंह, ज़िला अमृतसर (तत्कालीन ब्रिटिश भारत) में जन्मे मोहम्मद रफ़ी साहब बचपन से ही संगीत की ओर आकर्षित थे। उनकी आवाज़ में ऐसी मिठास थी कि सुनने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता था। मेहनत, लगन और अल्लाह की दी हुई इस नेमत के सहारे उन्होंने भारतीय सिनेमा को 7,000 से अधिक गीत दिए। हिंदी, उर्दू, पंजाबी, बंगाली, मराठी, गुजराती, भोजपुरी सहित अनेक भाषाओं में उनके गाए गीत आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं, जितने अपने दौर में थे।

रफ़ी साहब की गायकी की सबसे बड़ी ख़ूबी यह थी कि वे हर भावना को अपनी आवाज़ में ढाल देते थे। चाहे इश्क़ हो, दर्द हो, इबादत हो, क़व्वाली हो, ग़ज़ल हो, भजन हो या देशभक्ति—हर अंदाज़ में उनकी आवाज़ बेमिसाल थी। उनका मशहूर गीत “क्या हुआ तेरा वादा” उन्हें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार दिलाने वाला बना, जबकि भारत सरकार ने वर्ष 1967 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।

सादगी और इंसानियत की मिसाल
मोहम्मद रफ़ी साहब जितने बड़े कलाकार थे, उससे कहीं बड़े इंसान थे। वे बेहद सादा जीवन जीते थे और दिखावे से दूर रहते थे। फ़िल्म जगत में अनेक संघर्षरत संगीतकारों, निर्माताओं और कलाकारों की उन्होंने आर्थिक सहायता की। कई मौकों पर उन्होंने बिना पारिश्रमिक या बहुत कम मेहनताना लेकर गीत गाए। वे ज़रूरतमंदों की मदद चुपचाप करते थे और कभी उसका प्रचार नहीं करते थे। इसी वजह से लोग उन्हें केवल महान गायक ही नहीं, बल्कि नेकदिल इंसान भी मानते थे।

हज की सआदत
मोहम्मद रफ़ी साहब धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। उन्हें हज की सआदत भी नसीब हुई थी। हज से लौटने के बाद उनके जीवन में और अधिक सादगी तथा इबादत का रंग दिखाई देता था। वे नियमित नमाज़ पढ़ते थे और अपने धार्मिक कर्तव्यों का पूरा ध्यान रखते थे। उनके व्यक्तित्व में फ़न और दीनदारी का सुंदर संगम दिखाई देता था।

परिवार
रफ़ी साहब की पत्नी का नाम बिलक़ीस बानो था। अल्लाह ने उन्हें चार बेटे और तीन बेटियाँ, यानी कुल सात संतानें अता फ़रमाईं। परिवार के प्रति उनका गहरा लगाव था और वे घरेलू जीवन में भी अत्यंत सरल और प्रेमपूर्ण स्वभाव के थे।
गाने के अलावा क्या करते थे?

मोहम्मद रफ़ी साहब के बारे में ऐसा कोई प्रमाणित ऐतिहासिक रिकॉर्ड नहीं मिलता कि उन्होंने गायकी के अलावा कोई बड़ा व्यापार या व्यवसाय किया हो। उनका पूरा जीवन संगीत, परिवार, इबादत और समाज सेवा के लिए समर्पित रहा।

आज़ादी और देशभक्ति
भारत की स्वतंत्रता संग्राम में उनकी किसी सक्रिय राजनीतिक भूमिका का प्रमाण उपलब्ध नहीं है। वर्ष 1947 में भारत की आज़ादी के समय वे अपने संगीत करियर की शुरुआत कर रहे थे। लेकिन आज़ादी के बाद उन्होंने ऐसे अनेक अमर देशभक्ति गीत गाए, जिन्होंने हर भारतीय के दिल में वतन से मोहब्बत का जज़्बा पैदा किया। “कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियो” और “वतन पे जो फ़िदा होगा” जैसे गीत आज भी राष्ट्रीय अवसरों पर पूरे सम्मान के साथ सुने जाते हैं।

इंतिक़ाल
31 जुलाई 1980 (गुरुवार) को मुंबई में हृदयाघात के कारण मोहम्मद रफ़ी साहब का इंतिक़ाल हो गया। उस समय उनकी आयु 55 वर्ष थी। इस्लामी कैलेंडर के अनुसार उस समय रमज़ान 1400 हिजरी का मुबारक महीना चल रहा था। विभिन्न देशों में चाँद दिखाई देने के अंतर के कारण यह लगभग 17 या 18 रमज़ान का समय माना जाता है।

उनके जनाज़े में तेज़ बारिश के बावजूद मुंबई की सड़कों पर जनसैलाब उमड़ पड़ा। हजारों प्रशंसक, कलाकार और चाहने वाले उन्हें आख़िरी विदाई देने पहुँचे। यह दृश्य इस बात का गवाह था कि मोहम्मद रफ़ी केवल एक महान गायक नहीं, बल्कि करोड़ों दिलों की

धड़कन थे।
आज उनके इंतिक़ाल को कई दशक बीत चुके हैं, लेकिन उनकी आवाज़ आज भी हर दिल में ज़िंदा है। उनकी गायकी, सादगी, इंसानियत, दीनदारी और ख़ुलूस आने वाली नस्लों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहेंगे।

“आवाज़ें ख़ामोश हो जाती हैं, लेकिन मोहम्मद रफ़ी जैसी आवाज़ें सदियों तक गूंजती रहती हैं।”

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