उन्होंने कहा कि चारागाह जैसी सार्वजनिक उपयोग की भूमि को किसी अन्य उद्देश्य के लिए आवंटित करने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों के अनुरूप है या नहीं, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए। अकबर के अनुसार, वर्ष 2011 में राज्य सरकार के राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन के लिए सभी संभागायुक्तों और कलेक्टरों को पत्र जारी किया था, जिसमें चारागाह भूमि को सुरक्षित रखने और भविष्य में उसके अन्य उपयोग के लिए प्रस्ताव न भेजने के निर्देश दिए गए थे।
2024 के निर्देशों पर उठे सवाल
पूर्व मंत्री ने आरोप लगाया कि आवास एवं पर्यावरण विभाग के 4 अक्टूबर 2024 के निर्देशों के आधार पर रायपुर कलेक्टर द्वारा नकटी गांव की चारागाह भूमि को विधायक और सांसद आवासीय परियोजना के लिए हाउसिंग बोर्ड को सौंपने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। उनका कहना है कि यदि ऐसा होता है तो यह सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के विपरीत माना जा सकता है।
हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी मामले में न्यायालय की अवमानना हुई है या नहीं, इसका अंतिम निर्णय केवल संबंधित अदालत ही कर सकती है।
सरकार से मांगी स्थिति स्पष्ट करने की मांग
मोहम्मद अकबर ने कहा कि वर्ष 2011 में जारी राजस्व विभाग के निर्देश आज भी प्रभावी हैं। ऐसे में सार्वजनिक उपयोग की भूमि को खाली कराकर किसी अन्य परियोजना के लिए हस्तांतरित करने की तैयारी कई सवाल खड़े करती है। उन्होंने सरकार और प्रशासन से पूरे मामले पर आधिकारिक स्थिति स्पष्ट करने की मांग की।
अवमानना मामलों का भी किया जिक्र
अपने बयान में अकबर ने कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद अब तक किसी अधिकारी को न्यायालय की अवमानना के मामले में सजा नहीं हुई है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि राज्य गठन से पहले तत्कालीन मध्यप्रदेश के दौरान जबलपुर हाईकोर्ट ने रायपुर के संयुक्त पंजीयक सहकारिता को एक अवमानना प्रकरण में 15 दिन की सजा सुनाई थी।
उन्होंने कहा कि नकटी की चारागाह भूमि से जुड़े मामले में सरकार को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और राज्य सरकार के मौजूदा निर्देशों के अनुरूप पूरी स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए।
