जानकारों के अनुसार मेनिफोल्ड रूम वह स्थान होता है जहां उच्च दाब यानी हाई-प्रेशर मेडिकल ऑक्सीजन सिलेंडर एक केंद्रीय पाइपलाइन प्रणाली से जुड़े रहते हैं। यदि किसी सिलेंडर में लीकेज हो जाए, रेगुलेटर फेल हो जाए, वाल्व टूट जाए या ऑक्सीजन का अनियंत्रित रिसाव हो, तो ऑक्सीजन-समृद्ध वातावरण बन सकता है। ऐसी स्थिति में छोटी सी चिंगारी, विद्युत शॉर्ट सर्किट या ज्वलनशील पदार्थ के संपर्क से फ्लैश फायर, विस्फोट या तीव्र आग लगने जैसी बड़ी दुर्घटना की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिस क्षेत्र में यह मेनिफोल्ड रूम स्थित है, उसके आसपास मरीज और परिजन इलाज के इंतजार में बैठते हैं। किसी भी तकनीकी खराबी की स्थिति में सबसे पहले वही लोग प्रभावित हो सकते हैं। स्वास्थ्य सुरक्षा मानकों के अनुसार ऐसे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में नियंत्रित प्रवेश, पर्याप्त वेंटिलेशन, गैस डिटेक्शन सिस्टम, अग्निशमन उपकरण, स्पार्क-प्रूफ विद्युत व्यवस्था और स्पष्ट सुरक्षा घेरा अनिवार्य माना जाता है।
अब सवाल अस्पताल प्रबंधन से है। विशेषज्ञों का मानना है कि मेनिफोल्ड रूम को मुख्य भीड़भाड़ वाले उपचार क्षेत्र से अलग सुरक्षित जोन में स्थानांतरित किया जाए या अंतरराष्ट्रीय मेडिकल गैस सुरक्षा मानकों के अनुरूप नया संरक्षित कक्ष विकसित किया जाए। इसके साथ ऑटोमैटिक गैस मॉनिटरिंग सिस्टम, प्रेशर अलार्म, इमरजेंसी शट-ऑफ वाल्व, सीसीटीवी निगरानी और नियमित सेफ्टी ऑडिट लागू किए जाएं। समय रहते सुधारात्मक कदम उठाए गए तो किसी संभावित बड़ी अप्रिय घटना से मरीजों, परिजनों और अस्पताल स्टाफ की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
