छत्तीसगढ़

अगले तीन साल और युद्ध की संभावनाएँ

ट्रम्प की दुनिया : अगले तीन साल और युद्ध की संभावनाएँ
डोनाल्ड ट्रम्प की राजनीति को समझने के लिए यह मानना जरूरी है कि वे किसी परंपरागत कूटनीतिक स्कूल से नहीं आते। उनकी विदेश नीति न तो संस्थाओं से चलती है, न विचारधाराओं से, बल्कि पूरी तरह ‘व्यक्तित्व-केन्द्रित सत्ता’ की राजनीति है। ट्रम्प के लिए दुनिया नकशों और संधियों का समूह नहीं, बल्कि टीवी स्क्रीन पर चलने वाला एक तमाशा है, जिसमें हर संकट एक अवसर बन सकता है-घरेलू लोकप्रियता बढ़ाने का, विरोधियों को डराने का या मित्रों को वफ़ादार बनाए रखने का। यही कारण है कि उनके संभावित अगले कार्यकाल को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि आने वाले तीन वर्षों में कौन-कौन से देश अमेरिकी सैन्य या अर्ध-सैन्य कार्रवाइयों के सबसे ज़्यादा कऱीब हो सकते हैं। यह सवाल युद्ध की भविष्यवाणी नहीं करता, बल्कि उस राजनीतिक मानसिकता को समझने की कोशिश करता है, जिसमें शक्ति का प्रयोग आखऱिी विकल्प नहीं, बल्कि पहली प्रतिक्रिया बन जाता है।

ट्रम्प के पिछले कार्यकाल से एक बात साफ़ हुई थी-वे बड़े युद्धों से बचते हैं, लेकिन सीमित, प्रतीकात्मक और अचानक की गई कार्रवाइयों से परहेज नहीं करते। ड्रोन हमले, लक्षित हत्याएँ, आर्थिक प्रतिबंध और ‘आखिरी चेतावनी’ जैसी घोषणाएँ उनके औजार रहे हैं। यह रणनीति न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अस्थिर करती है, बल्कि दुनिया को स्थायी तनाव की स्थिति में भी रखती है। अगले तीन साल इसी अस्थिरता की कसौटी होंगे।

ईरान:सबसे आसान दुश्मन,  सबसे खतरनाक मोर्चा

ईरान ट्रम्प की युद्ध-कल्पना का सबसे स्पष्ट केंद्र रहा है और संभवत: रहेगा। परमाणु कार्यक्रम, इजराइल-विरोध, और पश्चिम एशिया में ईरानी प्रभाव-ये सब ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें अमेरिकी घरेलू राजनीति में ‘खतरे’ के रूप में बेचना आसान है। ट्रम्प पहले ही ईरान परमाणु समझौते को रद्द कर चुके हैं और जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या कर यह दिखा चुके हैं कि वे जोखिम उठाने से नहीं डरते। ईरान पर किसी सीमित सैन्य कार्रवाई-चाहे वह एयरस्ट्राइक हो या साइबर हमला-को वे ‘शक्ति का प्रदर्शन’ कहकर पेश कर सकते हैं, भले ही उसके परिणाम क्षेत्रीय युद्ध की ओर ले जाएँ।

ईरान के मामले में सबसे खतरनाक बात यह है कि दोनों पक्षों के पास पीछे हटने की बहुत कम गुंजाइश है। ईरानी शासन के लिए अमेरिका के सामने झुकना आंतरिक राजनीति में आत्महत्या जैसा होगा, जबकि ट्रम्प के लिए नरमी दिखाना ‘कमजोरी’ कहलाएगा। ऐसे में किसी छोटी घटना का बड़ा संकट बन जाना असंभव नहीं है। यही कारण है कि ईरान सिफऱ् संभावित लक्ष्य नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए अस्थिरता का स्रोत बना हुआ है।

चीन, रूस और ताइवान: युद्ध नहीं,  टकराव की स्थायी जमीन

चीन और रूस पर सीधा अमेरिकी हमला लगभग असंभव है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि टकराव की संभावना खत्म हो जाती है। ट्रम्प की चीन नीति व्यापार युद्ध, तकनीकी प्रतिबंध और सैन्य दबाव के मिश्रण पर आधारित रही है। ताइवान इस संघर्ष का सबसे संवेदनशील बिंदु है। ट्रम्प के दौर में ताइवान को लेकर बयानबाज़ी और सैन्य गतिविधियाँ बढ़ सकती हैं, जिससे किसी दुर्घटनावश टकराव का खतरा बना रहेगा। यह युद्ध शायद घोषित न हो, लेकिन उसकी छाया पूरी एशिया-प्रशांत राजनीति पर पड़ी रहेगी।

रूस के मामले में ट्रम्प की नीति और भी जटिल है। व्यक्तिगत स्तर पर वे पुतिन के प्रति नरमी दिखाते रहे हैं, लेकिन संस्थागत अमेरिका रूस को अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वियों में गिनता है। यूक्रेन, सीरिया और पूर्वी यूरोप ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ अमेरिका-रूस के हित टकराते हैं। ट्रम्प इन मोर्चों पर सीधा युद्ध नहीं चाहेंगे, लेकिन परोक्ष टकराव, हथियारों की आपूर्ति और आर्थिक दबाव बढ़ सकते हैं। यह ‘शीत युद्ध का नया संस्करण’ होगा-कम वैचारिक, ज़्यादा अवसरवादी।

लैटिन अमेरिका और पश्चिम एशिया :  पुराने पैटर्न, नए बहाने

वेनेजुएला, इराक, सीरिया और यमन जैसे देश ट्रम्प की विदेश नीति में हमेशा ‘दूसरी पंक्ति’ के लक्ष्य रहे हैं। वेनेजुएला में समाजवादी सरकार, तेल संसाधन और अमेरिकी प्रभाव क्षेत्र-तीनों कारण मिलकर उसे आसान निशाना बनाते हैं। ‘लोकतंत्र बहाली’ या ‘मानवीय हस्तक्षेप’ जैसे शब्दों के साथ किसी कार्रवाई को वैध ठहराया जा सकता है। इराक और सीरिया में अमेरिकी मौजूदगी पहले से है; वहाँ किसी नई झड़प को बढ़ावा देना मुश्किल नहीं होगा।

यमन का मामला सबसे ज़्यादा विडंबनापूर्ण है। वहाँ दुनिया के सबसे बड़े मानवीय संकटों में से एक जारी है, लेकिन अमेरिका की भूमिका अक्सर पर्दे के पीछे रहती है। ईरान-सऊदी तनाव बढ़ा तो यमन फिर से महाशक्तियों का अखाड़ा बन सकता है। इन सभी मामलों में एक बात समान है-यह युद्ध नहीं, बल्कि लगातार चलने वाला संकट होगा, जो कभी सुर्खियों में आएगा, कभी गायब हो जाएगा।

चयनात्मक नैतिकता और असली खतरा

ट्रम्प की विदेश नीति का सबसे खतरनाक पहलू उसकी चयनात्मक नैतिकता है। जहाँ दुश्मन देश हों, वहाँ मानवाधिकार, लोकतंत्र और महिलाओं की आजादी अचानक बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। लेकिन जहाँ सहयोगी देश वही अपराध करें-जैसे फिलिस्तीन में नागरिकों की हत्या-वहाँ चुप्पी छा जाती है। यह दोहरा मापदंड वैश्विक व्यवस्था की नैतिक नींव को खोखला करता है। दुनिया को यह संदेश जाता है कि न्याय नहीं, ताकत निर्णायक है। अगले तीन वर्षों में शायद हर जगह युद्ध न हो, लेकिन युद्ध का डर, अस्थिरता और अनिश्चितता जरूर बनी रहेगी। यही ट्रम्प की राजनीति की पहचान है-शांति को स्थायी लक्ष्य नहीं, बल्कि अस्थायी विराम मानना। और यही सबसे बड़ा ख़तरा है: एक ऐसी दुनिया, जहाँ संकट स्थायी हो जाए और समाधान सिर्फ तमाशा बनकर रह जाए।

 

 

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