31 Oct 25 – रबी सीजन की शुरुआत के साथ ही देशभर में किसान आलू की बुवाई की तैयारी में जुट गए हैं। आलू एक लाभदायक नगदी फसल है, लेकिन बदलते मौसम, रोगों और कीटों के प्रकोप से इसकी पैदावार और गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ता है। धानुका एग्रीटेक ने किसानों को स्वस्थ और लाभदायक फसल सुनिश्चित करने के लिए वैज्ञानिक फसल प्रबंधन और संरक्षण पद्धतियों को अपनाने की सलाह दी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, किसानों को हमेशा प्रमाणित और रोग-मुक्त बीज आलू का उपयोग करना चाहिए। बेहतर अंकुरण के लिए मध्यम आकार के स्वस्थ गांठें चुनना लाभदायक है। क्षेत्र और तापमान के अनुसार, बुवाई का सही समय अक्टूबर के मध्य से नवंबर के मध्य तक माना जाता है। मिट्टी भुरभुरी, जैविक पदार्थों से भरपूर और जल निकासी युक्त होनी चाहिए। पौधों के बीच 20–25 सेंटीमीटर और कतारों के बीच 60 सेंटीमीटर की दूरी रखना जरूरी है ताकि पौधे अच्छे से बढ़ें और हवा का प्रवाह सही बना रहे।
आलू फसल को प्रभावित करने वाली मुख्य बीमारियों में अर्ली ब्लाइट और लेट ब्लाइट शामिल हैं, जो ठंडे और नमी वाले मौसम में तेजी से फैलती हैं। इनसे बचाव के लिए अंकुरण के तुरंत बाद फफूंदनाशी दवाओं का छिड़काव शुरू करना चाहिए। बीज उपचार के लिए थायोफेनेट मिथाइल 38% + कासुगामाइसिन 2.21%, जबकि पत्तियों पर छिड़काव के लिए एमिसुलब्रोम 20% SC, मैंकोजेब 75% WP और कार्बेन्डाजिम 12% + मैंकोजेब 63% WP जैसी दवाएं प्रभावी मानी जाती हैं। नियमित छिड़काव और फसल चक्र अपनाने से बीमारी के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
स्वस्थ कंदों के विकास के लिए समान नमी बनाए रखना आवश्यक है। स्प्रिंकलर या ड्रिप सिंचाई से नमी संतुलन बना रहता है। इसके साथ ही नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटैशियम और जैविक खादों का सही अनुपात में प्रयोग फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों बढ़ाता है।
धानुका एग्रीटेक के आधुनिक फसल सुरक्षा समाधान जैसे पर्यावरण के अनुकूल फफूंदनाशी और बायोस्टिमुलेंट्स, किसानों को सर्दियों की इस अहम फसल को बीमारियों और कीटों से बचाने में मदद करते हैं। वैज्ञानिक खेती और समय पर फसल सुरक्षा से किसान अधिक पैदावार और बेहतर आय सुनिश्चित कर सकते हैं।
